एक लेख पढ़ा जिसमे बताया गया कि पटना और बिहार में स्थितिया काफी बदल गयी हैं . जिस पटना में शाम ७ बजे के बाद आम आदमी का शहर की सडको पर सुरक्षित रहना मुश्किल था अब वहां रात ११ बजे भी लड़कियां सुरक्षित घूम सकती हैं. पैमाने के तौर पर ये बात कहे जाने योग्य है.लेकिन आज़ादी के ६० सालों के बाद हम प्रगति के जिस मक़ाम पर पहुचे हैं, क्या इसी प्रगति की कल्पना उस समय के एक आम आदमी ने की होगी? दूरद्रष्टा महानेतागणों की बात जाने दें. आम आदमी अपनी सीमाओं में रहते हुए क्या और कितना सोच पाता है, मैं उसकी बात करना चाहता हूँ. देश को प्रगति के सोपान पर ले जाने की सोच बनाते समय देश कें सबसे कमज़ोर व्यक्ति के बारे में सोचना शायद प्रगति की राह में रोड़े अटकाना होगा. लेकिन हमारे राष्ट्रपिता ने इसी कमज़ोर व्यक्ति को पैमाना बनाना चाहा था. रात ११ बजे पटना में बाज़ार में घूमने वाली लड़किया पैमाना बनें, ये बापू की कल्पना में भी नहीं होगा. उनका पैमाना उस ग़रीब मजदूर का परिवार होता जो राष्ट्रमंडल खेल जैसे आयोजनों की आंधी में बेघर हो जाता है. पटना एक गर्त से निकल कर मुंबई चेन्नई की रंगीनियों की राह पर चल पड़ा है, यह प्रगतिवादियों के लिए संतोष की बात होगी लेकिन मेरे जैसे कुछ लोग तो होंगे ही जिन्हें दुःख होता है कि ६० बरस पहले के भारत में जिस मानवता, संस्कृति और भारतीयता की पहचान हमारी अपनी पहचान थी वह इन ६० बरसो में धो पोंछ दी गई और भारत को इंग्लैंड अमेरिका की संस्कृति को ढोने के योग्य बना दिया गया. वह संस्कृति जो भारत की संस्कृति के सर्वथा विपरीत थी. जी हाँ, आज के भारत को देख कर कोई भारतीय संस्कृति के दर्शन नहीं कर सकता. आज की भारतीय बाज़ार संस्कृति को अब हेय दृष्टि से देखने वाला कोई नहीं है. यदि कोई है तो वह अविकसित और जड़ बुद्धि वाला कहा जाएगा. आज हम आपस में केवल 'लाभ' के लिए जुड़े रह सकते हैं. या तो लाभ दें या लाभ लें. शेष सम्बन्ध पुराविचारवादियों के लिए सुरक्षित कर दिए गए हैं.
आज के लड़के लड़किया बहुत उर्जावान और कमाऊ हैं. बीस बाईस की उम्र में यदि कोई युवा २० हज़ार रूपए नहीं कम लेता तो वह अपनी युवा मंडली मे एडजस्ट करने के योग्य नहीं है. लाखों रूपए लगा कर शिक्षा पाने का मात्र उद्देश्य यही है कि अपने समाज में वह पैसे के दम पर इज्ज़त के साथ खड़ा हो सके. इसी लिए लड़के लड़की में भेद भी मिटा दिया गया क्योकि पैसा तो सभी को चाहिए. बल्कि लड़की को तो लडको से ज्यादा चाहिए. लैंगिक अंतर के कारण लड़की के खर्चे लडको की तुलना में ज्यादा हैं. इसलिए ज़रूरी है की उसे लड़कों से ज्यादा न सही उनके बराबर का ओहदा तो मिले ही. हमें इस मुगालते में नहीं रहना चाहिए की आज पुरुष ने स्त्री को बराबर का दर्जा दिया है. यह तो बाज़ार संस्कृति की डिमांड है.इसके बिना बाज़ार चल नहीं सकता.
सुना कि लखनऊ भी अब युवाओं को रोज़गार देने में प्रमुख शहरों के साथ है. कितने हर्ष की बात है की बाज़ार अब बड़े महानगरों को लीलने के साथ छोटे नगरों में भी अपने नाख़ून गड़ो रहा है. हमारी प्रसन्नता हमारे किन दुखों को हमारी ही कोठरी में बंद कर रही है ये हम जान नहीं पा रहे हैं. वातानुकूलन की ठण्ड में कोई भला कैसे कल्पना कर सकता है कि हम कितना ताप अपनी प्रकृति में उगल रहे हैं. ये तो वह मिस्त्री ही जान सकता है जो वातानुकूलन की गर्म मशीनों के साथ काम करता है. और घर जाकर अपनी जली देह में सूखी रोटी डाल कर फिर से जलने को तैयार होता है. बाज़ार संस्कृति हमारे युवा कोंपलों को रोज़गार देकर हमारा जो भला कर रही है उसे समझ पाना लगभग असंभव के बराबर मुश्किल है. १५ से २० घंटे जीतोड़ मेहनत करके बच्चे जो पैसा कम रहे हैं उससे भी उनका काम नहीं चलता. उन्हें और और पैसे चाहिए. एक ज़माना था जब ऐसा नहीं था. या हमारे समाज का एक वर्ग अब भी ऐसा है जो एक निश्चित वेतन पाकर अपना काम चला लेता है और संतुष्ट है. बाज़ार की रंगीनियाँ उसे आकर्षित तो करती हैं लेकिन वह मोहित नहीं होता.
बाज़ार कल्चर युवाओं में जितना पैसा बाटेगा उसे उतना मुनाफा होगा. क्योकि उसका ग्राहक भी वही है जिसको वह पैसा दे रहा है. दोनों ही एक दूसरे पर निर्भर करते हैं. ये ठीक वैसे ही है जैसे टी बी का रोग.टी बी के विषाणु मरीज़ की भूख को मारते हैं. मरीज़ जितना कमज़ोर होता है उसका भोजन उतना क्म हो जाता है. और भोजन जितना क्म होता है, टी बी के विषाणु उतने शक्तिशाली होते जाते हैं.
हजारों लाखों रूपए कमाने वाले युवा भले आज अपने बाप दादाओं की तुलना में कई गुना संपन्न दिखें लेकिन अंततः जब संतोष की बात आएगी तो ये युवा अपने बाप दादाओं के सामने ग़रीब ही कहलाएँगे.भले ही आज का युवा अपनी मेहनत के दम पर एक साल में वह सब कुछ हासिल कर ले जिसे पाने में पहले के लोगों की सारी उम्र गुज़र जाती थी. लेकिन धन संपत्ति के अलावा नैतिकता, मानवता ,संतोष और भारतीयता के गुणों की संपत्ति की जो हानि ये बाज़ार संस्कृति कर रहा है उसे देखने की आवश्यकता है. अब तो 'बाजारू' कहने पर भी मन संशय में पड़ जाएगा कि यह गाली है या तारीफ का एक नया शब्द.
आज के लड़के लड़किया बहुत उर्जावान और कमाऊ हैं. बीस बाईस की उम्र में यदि कोई युवा २० हज़ार रूपए नहीं कम लेता तो वह अपनी युवा मंडली मे एडजस्ट करने के योग्य नहीं है. लाखों रूपए लगा कर शिक्षा पाने का मात्र उद्देश्य यही है कि अपने समाज में वह पैसे के दम पर इज्ज़त के साथ खड़ा हो सके. इसी लिए लड़के लड़की में भेद भी मिटा दिया गया क्योकि पैसा तो सभी को चाहिए. बल्कि लड़की को तो लडको से ज्यादा चाहिए. लैंगिक अंतर के कारण लड़की के खर्चे लडको की तुलना में ज्यादा हैं. इसलिए ज़रूरी है की उसे लड़कों से ज्यादा न सही उनके बराबर का ओहदा तो मिले ही. हमें इस मुगालते में नहीं रहना चाहिए की आज पुरुष ने स्त्री को बराबर का दर्जा दिया है. यह तो बाज़ार संस्कृति की डिमांड है.इसके बिना बाज़ार चल नहीं सकता.
सुना कि लखनऊ भी अब युवाओं को रोज़गार देने में प्रमुख शहरों के साथ है. कितने हर्ष की बात है की बाज़ार अब बड़े महानगरों को लीलने के साथ छोटे नगरों में भी अपने नाख़ून गड़ो रहा है. हमारी प्रसन्नता हमारे किन दुखों को हमारी ही कोठरी में बंद कर रही है ये हम जान नहीं पा रहे हैं. वातानुकूलन की ठण्ड में कोई भला कैसे कल्पना कर सकता है कि हम कितना ताप अपनी प्रकृति में उगल रहे हैं. ये तो वह मिस्त्री ही जान सकता है जो वातानुकूलन की गर्म मशीनों के साथ काम करता है. और घर जाकर अपनी जली देह में सूखी रोटी डाल कर फिर से जलने को तैयार होता है. बाज़ार संस्कृति हमारे युवा कोंपलों को रोज़गार देकर हमारा जो भला कर रही है उसे समझ पाना लगभग असंभव के बराबर मुश्किल है. १५ से २० घंटे जीतोड़ मेहनत करके बच्चे जो पैसा कम रहे हैं उससे भी उनका काम नहीं चलता. उन्हें और और पैसे चाहिए. एक ज़माना था जब ऐसा नहीं था. या हमारे समाज का एक वर्ग अब भी ऐसा है जो एक निश्चित वेतन पाकर अपना काम चला लेता है और संतुष्ट है. बाज़ार की रंगीनियाँ उसे आकर्षित तो करती हैं लेकिन वह मोहित नहीं होता.
बाज़ार कल्चर युवाओं में जितना पैसा बाटेगा उसे उतना मुनाफा होगा. क्योकि उसका ग्राहक भी वही है जिसको वह पैसा दे रहा है. दोनों ही एक दूसरे पर निर्भर करते हैं. ये ठीक वैसे ही है जैसे टी बी का रोग.टी बी के विषाणु मरीज़ की भूख को मारते हैं. मरीज़ जितना कमज़ोर होता है उसका भोजन उतना क्म हो जाता है. और भोजन जितना क्म होता है, टी बी के विषाणु उतने शक्तिशाली होते जाते हैं.
हजारों लाखों रूपए कमाने वाले युवा भले आज अपने बाप दादाओं की तुलना में कई गुना संपन्न दिखें लेकिन अंततः जब संतोष की बात आएगी तो ये युवा अपने बाप दादाओं के सामने ग़रीब ही कहलाएँगे.भले ही आज का युवा अपनी मेहनत के दम पर एक साल में वह सब कुछ हासिल कर ले जिसे पाने में पहले के लोगों की सारी उम्र गुज़र जाती थी. लेकिन धन संपत्ति के अलावा नैतिकता, मानवता ,संतोष और भारतीयता के गुणों की संपत्ति की जो हानि ये बाज़ार संस्कृति कर रहा है उसे देखने की आवश्यकता है. अब तो 'बाजारू' कहने पर भी मन संशय में पड़ जाएगा कि यह गाली है या तारीफ का एक नया शब्द.

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