Saturday, November 13, 2010

आकाश होना है मुझे

ऐ आकाश
किसमे देखूं तेरा विस्तार
तू सबका है
अपना आकाश /
सब ढूंढते हैं तुझमे खोया
अपना साथी/
और तू ईश्वर सा अनबोलता 
सुनने देता है सबको
 अपनी प्रतिध्वनि/
श्वानदुःख भी समेटता है तू
चार आँखों के सपने भी संभालता है तू /
कड़कते ह्रदय का दंश भी तू ही झेलता है
आँखों का नीर भी उकेरता है तू/
ऐ विशाल
चाँद तारे कौन हैं तेरे/
क्या सबके सपनों के दस्तावेज़ इन्हीं में रखता है तू/
मैं जानता हूँ
सब कुछ ख़त्म होगा
पर तू नहीं
देख
मैं अपने सारे  सपनों को
आज  तुझसे कहूँगा/
पर बीते लम्हे नहीं मांगूंगा तेरे तारों से
न ही
चाँद से कहूँगा
की उसकी चांदनी
मुझे गुदगुदाए/
बस
मेरे टूटते सपनों को
छुपा देना चाँद के पीछे
 और मुझसे कहना
विस्तार के एक एक कण को जीना है मुझे/
मिलकर
तुझमे घुलकर
आकाश होना है मुझे/

   

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