Monday, January 3, 2011

यादों के बिस्तर पर करवट बदलती उम्मीद
शहर के दरवाज़े में दाखिल हो
अँधेरे उजाले से बेखबर
चलती ही जाती है खुद के मिट जाने तक /

उम्मीद का दामन एक पल जब छूट जाता है
यादों का शोर छीन लेता है बदन की  ताक़त
समंदर की मौज बनकर /

यादों की बारिश में भीगी आँखें
ढूंढ लेंगी उम्मीद का दमन फिर से
गर मिल जाए उजाला तुम्हारी आँखों का
तसव्वुर ही में सही /

आँखें तुम्हारी मेरी नज़रों में रहन न रहें
फ़र्क ख़त्म हो गया  होने न होने का
तेरी आँखों के समंदर में डूबने के बाद
जीना क्या और मरना क्या /

मत पूछ मोहब्बत की हद क्या है
ज़िन्दगी क्या जाने मौत की तारीख को /

तुम्हारे प्यार की चादर जब ओढ़ लेता हूँ
पैर के कांटे फूल बन जाते हैं
तुम्हारी गर्म साँसें सेंक देंती हैं
मेरे हरे ज़ख्मों को /

ऐतबार खत्म नहीं होता अपनी मोहब्बत का
कोई तो बता दे
दुनियां में लगी आग क्यों जलती है मेरे सीने में /

उम्मीदों में गुजरी जगाने वाली रातों का
सिलसिला ख़त्म कहाँ होता है सुबह दोपहर और शाम तक
ज़िन्दगी से लुटने का खौफ
मिलने की आस लिए छोड़ता जाता है अपनी मुट्ठी से
वक़्त की रेत धीरे धीरे
खाली शाम के रात होने और फिर सुबह होने तक /

1 comment:

  1. शायद 'शीर्षक' सोने जैसे पोस्ट पर सुहागा डाल दे !

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